लॉक डाउन से बर्बाद होता किसान, सरकार कर रही सामाजिक संगठनों की अनदेखी : डाॅ.सुनीलम्
April 4, 2020 • Admin

भोपाल । लाॅक डाउन का सबसे विपरीत असर किसानों, खेतिहर मजदूरों,गरीबों  पर पड़ रहा है। किसानों को सब्जी दुध बेचने के लिए शहर मे जाना संभव नही हो पा रहा है । मजदूर खेत तक नहीं पहुंच पा रहे । सरकार ने खरीद का कोई व्यवस्था  तंत्र विकसित नही किया है यह कहना है किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष डाॅ.सुनीलम् का उन्होंने आगे कहा कि  देश के किसान संगठनों के प्रयास से कृषि को लाॅक डाउन से बाहर कर दिया गया ,उसके बावजूद भी मंडियां नही खुली है। हाट बाजार भी बन्द हैं ।

डाॅ.सुनीलम् कहां कि समर्थन मूल्य पर खरीद की कोई व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की गई  है । कल मेरे पास झाबुआ के सेमलिया गांव से गोपाल डामोर का  फोन आया था वे बता रहे थे कि गाँव मे व्यापारी 1200--1300 रू. क्विंटल पर गेंहू खरीद  रहे है । मुलतापी,बड़वानी सहित पूरे  मध्यप्रदेश  के ग्रामीण अंचल मे 1500 रू के आस-पास व्यापारी गेंहू खरीद रहे है जबकि 2100 रू ( बोनस सहित ) खरीद की घोषणा मुख्यमंत्री ने की है । किसानों को 2000 रू.की किसान सम्मान निधि की घोषणा की गयी थी, वह भी किसानों के खाते में नही पहुंची है ।इसी तरह के तमाम मुद्दे है जिनपर कार्य करने की जरूरत है । मनरेगा तथा सभी निर्माण के काम बंद है। गरीब जो रोज खाते कमाते हैं वे न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि  देश के डाॅक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों,सफाई कर्मियों  तथा अस्पतालों मे जाने वाले प्रशासनिक पुलिसकर्मियों और पत्रकारों को माॅस्क,सेनेटाईजर,ग्लब्स् ,आँख कवर करने के लिए चश्मा तथा पूरे शरीर को ढंकने आदि के लिए पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट  ( PPE) , सभी संदिग्ध मरीजों की टेस्टिंग किट से जाँच कराने तथा  100 मे से 20  कोरोना मरीजों के लिए आवश्यकता पड़ने पर वेंटिलेटर और आई सी यु बेड का इंतजाम करने की जरूरत है,लॉक डाउन के बाद की तैयारियों की भी जरूरत है।
देश भर में लाखों स्वयं सेवी संगठनों ,जनसंगठनों ,किसान 
,मजदूर ,आदिवासी ,दलित ,अल्पसंख्यक ,महिला ,छात्र युवा ,मानवाधिकार,पर्यावरण ,ग्रामीण विकास ,पेंशनधारियों के संगठनों से जुड़े  कार्यकर्ता राष्ट्रीय विपदा के इस काल मे सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करने के इक्छुक हैं , स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधि शासन को मैदानी कामो में मदद करना चाहते हैं। लेकिन सरकार ने  कोरोना के संक्रमण को कानून व्यवस्था का प्रश्न बना दिया है। यह सही है  स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्देशों का पालन आवश्यक है । परंतु यह काम केवल पुलिस प्रशासन पर छोड़ने की बजाए उसमें सामाजिक कार्यों में गांव ,मोहल्लों में  सक्रिय सामाजिक और राजनीतिक  कार्यकर्ताओं को जोड़कर किया जाना चाहिए ।
जो सब लोग समाज और देश के लिए कुछ करना चाहते है उनको आपदा प्रबंधन में शामिल करने की बजाय सरकार ने उन्हें भी घर बैठा दिया है।  महामारी  अभी कंट्रोल में है लेकिन बेकाबू होते ही पूरा तंत्र चरमरा जाएगा क्यों कि जनस्वास्थ्य सरकार की प्राथमिकता कभी नहीं रही है।
10 हज़ार की आबादी पर  6 डॉक्टर , 13 नर्स ,और  9 बेड  उपलब्ध हैं , देश में कुल 40 हज़ार वेंटीलेटर और 70 हज़ार आई सी यू बेड  उपलब्ध है ( हमारा स्वाथ्य बजट कुल बजट का 2 प्रतिशत भी नहीं है ) जो महामारी फैलने की स्थिति में किसी भी एक राज्य की स्वास्थ्य आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाएंगे।
डाॅ.सुनीलम् ने कहा कि इन जरूरतों केेे साथ साथ स्वास्थ्य के व्यापक मुद्दों पर ध्यान  केंद्रित करने की बजाय प्रधानमंत्री  थाली,ताली बजवा रहे हैं। अब उन्होंने दीपक , मोमबत्ती और टाॅर्च जलाने की 5 अप्रैल की रात 9 बजे की अपील की है। जिसे ज्योतिष से जोड़कर सोशल मीडिया में देखा जा रहा है। महामारी की रोकथाम और उपचार वैज्ञानिक तरीकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह को सही तरीके से लागू करने से  ही संभव है अंधविश्वास फैलाने से नहीं।