आखिर क्यों खामोश है मुस्लिम बुद्धिजीवी
April 8, 2020 • धर्मेंद्र पैगवार

 

इन दिनों हिंदुस्तान में गूगल पर सबसे ज्यादा यदि कुछ सर्च हो रहा है तो वह शब्द तबलीगी है। इसके मायने होते हैं अल्लाह की बात को आम आदमी तक पहुंचाने वाला मतलब दीन और मजहब की बात का प्रचार। लेकिन अभी जो कुछ हुआ उससे तबलीगी जमात में इस शब्द के मायने बदल दिए हैं। इस सबके बावजूद मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग खामोश है। देश में कुछ घटनाएं होने पर आमिर खान का यह बयान आया था कि उन्हें भारत में रहने में डर लगता है, अब आमिर खान चुप है लेकिन अब पूरा हिंदुस्तान अमीर से लेकर गरीब तक सब डरे हुए हैं। कारण कोरोना वायरस है और जो आंकड़े आए हैं उसमें इस संक्रमण का संवाहक सबसे ज्यादा तबलीगी जमात बनी है। 
आमिर खान तो एक फिल्म कलाकार है उन्हें बुद्धिजीवियों की श्रेणी में नहीं भी माना जाए तो समय-समय पर अपने बयानों को लेकर मुस्लिम समाज की तरफदारी करने वाले बुद्धिजीवी जावेद अख्तर और नसरुद्दीन शाह ने भी अभी चुप्पी ओढ़ रखी है। उत्तर प्रदेश में होने वाली किसी घटना पर मुंबई में बैठकर बयान देने वाले यह दोनों बुद्धिजीवी इन दिनों किन कारणों से चुप है इसका भी पता लगाया जाना चाहिए। 
इन दोनों के बाद देश के हर नागरिक को एक सिविल सोसाइटी की भी याद आ रही है। कुछ कट्टरपंथियों की हरकतों पर पूरे देश और हिंदू समाज को निशाने पर लेने वाली यह सिविल सोसायटी अभी कंबल ओढ़ कर सो गई है। लगता है इनके मुंह में दही जमा है प्रशांत भूषण से लेकर मेघा पाटकर तक तीस्ता सीतलवाड़ से लेकर वृंदा करात तक। 

गाजियाबाद में भर्ती हुए तबलीगी जमात के लोग महिला नर्सिंग स्टाफ से अश्लील हरकतें कर रहे हैं। यह बात किसके लिए शर्मनाक है यह उन लोगों को सोचना चाहिए जो तबलीगी जमात के लोगों के आने पर अपना काम धंधा छोड़ कर चुपचाप मुंडी झुकाए उनकी बातें सुनते हैं। मैं पुराने शहर में रहता हूं मुस्लिम आबादी यहां बहुसंख्यक है। उनके रीति रिवाज रिवायतें अच्छे से जानता हूं। कोई मुस्लिम परिवार का लड़का जब बिगड़ जाता है माता पिता का कहना नहीं मानता पढ़ाई नहीं करता काम धंधे पर नहीं जाता तो लोग उसके परिवार को सलाह देते हैं की बेटे को जमात में भेज दो। बेटा दीन की बातें सीखेगा उन पर अमल करेगा और एक अच्छा अनुशासित तमीजदार इंसान बनेगा। लेकिन अभी जो तबलीगी कर रहे हैं खासतौर पर उन्होंने गाजियाबाद में जो किया उससे क्या कोई शरीफ परिवार अपने बेटे को इन लोगों के साथ सुधरने के लिए भेजेगा।
मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग की चुप्पी ने तबलीगी जैसे एक पवित्र शब्द को लेकर उठी आग में घी डालने का ही काम किया है। जिनको दीन की बातों का प्रचार करना था जिन्हें अल्लाह की कही बातों पर अमल के लिए लोगों को तैयार करना था वे क्या कर रहे हैं? असल में भटके हुए नौजवान तो यही है लेकिन इन्हें राह दिखाने के लिए कोई सामने क्यों नहीं आ रहा है। भोपाल से लेकर पूरे हिंदुस्तान के मुशायरे में जब यह शेर पढ़ा जाता है कि किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है... तो इस पर तालियां बटोरने वाले राहत इंदौरी भी इस दौर में चुप है। जबकि उनके शहर जिससे उनकी पहचान है वहां मेडिकल स्टाफ को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया है।
अब आम जनता में निजामुद्दीन मरकज से निकली इस तबलीगी जमात के इरादों पर उंगलियां उठने लगी है। कुछ लोग इन्हें सीख देने के बजाय इनकी पैरवी कर रहे हैं। यह वह दौर   है जिसमें मानव जाति को बचाने की जद्दोजहद पूरी दुनिया में चल रही है और कुछ लोगों की जहालत के कारण पूरी कौम शंका के कटघरे में आ गई है। इस शंका का निवारण और जहालत को रोकने की कोशिश इस तबके के बुद्धिजीवियों के हाथ में है। लेकिन भी चुप हैं।

ऐसे में इकबाल का यह शेर याद आता है...

वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में,
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्तां वालों, तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।।